बकरा ईद: अहंकार की बलि और रूहानी मिलन
बकरा ईद: अहंकार की बलि और रूहानी मिलन

बकरा ईद: अहंकार की बलि और रूहानी मिलन
बकरा ईद: अहंकार की बलि और रूहानी मिलन
आज ईद-अल-अधा या बकरा ईद मनाया जा रहा है। अब्राहम, ईश्वर, भगवान, अल्लाह से बहुत प्रेम करते थे। अब्राहम से आगे इस्माइल हुए, और उसी वंश में आगे बढ़ते-बढ़ते हज़रत मोहम्मद साहब आए। अब्राहम से यहूदी धर्म शुरू हुआ। उससे पहले भी अनेक धर्म थे, और बाद में मोहम्मद साहब के साथ इस्लाम धर्म की स्थापना हुई।
अब्राहम की औलाद नहीं हो रही थी। उन्होंने बहुत मन्नत मांगी। तब औलाद हुई, जिसका नाम इस्माइल रखा गया। औलाद होने पर अब्राहम बहुत खुश हुए कि भगवान ने उन्हें दिया है। वे ईश्वर के मुरीद हो गए। हर समय ईश्वर का नाम, “तू ही तू प्रभु प्यारे”,करते-करते वे इतनी भक्ति में बह गए कि उन्हें केवल भगवान ही दिखाई देने लगा, कुछ और नजर नहीं आता था।
जब अब्राहम इतनी मेहनत और पुरुषार्थ कर रहे थे, तो अल्लाह, भगवान, ने कहा, अब परीक्षा का समय आ गया है। जब तक लगन नहीं बढ़ती, तब तक परीक्षा नहीं होती; जैसे ही भक्ति यानी परमात्मा से प्रेम बढ़ता है, मिलने की तड़प होती है, तो परीक्षा आती है। “मुझे उसको मिलना है जिसने मुझे बनाया”, जब यह तड़प जागती है, तो अल्लाह , भगवान परीक्षा लेते हैं।
वो अल्लाह, भगवान, गॉड अब्राहम की परीक्षा लेने के लिए उतरे। आवाज आती है, “अब्राहम, क्या तू मुझसे मिलना चाहता है?” उन्होंने कहा, “हाँ प्रभु।” प्रभु कहते हैं, “जो मुझसे मिलना चाहता है, उसका मैं सब कुछ ले लेता हूँ। यह ब्रह्मांड मुझसे बना है, और इसके पदार्थों पर इंसान ने कब्जा कर लिया है, सब अपना मान बैठा है। इसलिए अगर तू मुझसे मिलना चाहता है, तो जो आज तक तूने ‘मेरा’ कहा, क्या उसे लौटाएगा?” क्योंकि अब्राहम भक्ति में डूबे थे, उन्होंने कहा, “हाँ, प्रभु।”
उसी समय आदेश हुआ, “मुझे तेरा प्यारा बेटा लौटा दे।” हाथ में चाकू लेकर उसकी गर्दन काट; वह मेरे पास आ जाएगा। अब्राहम एक पल के लिए ठिठके; वह प्यारा बेटा, जो मन्नतों के बाद मिला था और परमात्मा कहता है गर्दन काट। लेकिन अगले ही पल उन्होंने कहा, “हाँ प्रभु।” वे जाते हैं, और जैसे ही बच्चे को चाकू मारने लगते हैं, चाकू गर्दन तक आता है, पर आगे नहीं जाता, और बच्चा हाथ से खिसक जाता है।
अल्लाह कहते हैं, “अब्राहम, तू पास हो गया। तू सच में मेरा हो गया।” तब चेतना परम चेतना से जुड़ गई और अब्राहम के भीतर अल्लाह प्रकट हो गए। अब्राहम नहीं बचे, अल्लाह आ गए, और अब अब्राहम अल्लाह के दूत बन गए। उन्होंने संसार को वाणी दी कि तेरा कुछ भी नहीं है, सब अल्लाह का है, उसे वापस लौटा दे। वे कहते चले गए, मुख से निकलता गया, और वही वाणी आगे चलकर ग्रंथ बन गई।
इसी घटना से बकरा-ईद का संबंध बताया जाता है। जब बेटे को बचा लिया गया, तो एक बकरा पेश हुआ और उसकी कुर्बानी दी गई। यह एक कहानी है, पर इसका संदेश सच्चा है। अध्यात्म में जब भी कोई कथा किसी परमात्मा के दूत से आती है, तो उसका संदेश सदा सत्य होता है। तब बकरे की कुर्बानी दी गई, और वहीं से बकरा-ईद की परंपरा चली।
देखो, शब्द क्या कहते हैं: बकरे की गर्दन काटी गई। और “ईद” क्या है? मिलन। एक-दूसरे को गले मिलना, नए कपड़े पहनना। बकरा क्या है? “मैं, मैं।” अब्राहम ने अपने अहंकार की गर्दन काट दी। उन्होंने ‘मैं’ और ‘मेरा’ छोड़ दिया। अब तक जो कुछ भी अपना था, सब समर्पित कर दिया।
तो कटा क्या? ‘मैं’ और ‘मेरा’ यानी अहंकार। चमड़े की गर्दन कटी या नहीं, उसका पता नहीं; पर बकरे की गर्दन कटी ,यह कहानी बताती है; पर असली गर्दन कौन सी थी? मैं और मेरा की; अहंकार, होमै की थी। जब वो गर्दन कटेगी तो क्या होगा? ईद, ईद यानी मिलन, किसका? आत्मा से आत्मा का मिलन, अंदर की ज्योत का ज्योत से मिलन, चेतना का चेतना से मिलन, “आत्मा पश्यन्ति आत्मा !” एक हो गए; ये है मिलन। बाहर के चमड़े के शरीर से तो संसार मिलता है, आत्माओं का मिलन कभी-कभी धरती पर होता है। यही सच्चा मिलन है।
इसलिए बकरा-ईद का अर्थ है कि जब अहंकार की गर्दन कटेगी तो आत्मा का मिलन होगा। जन्म से और मृत्यु के बीच में कोई हिंदू, कोई मुसलमान, कोई सिख, कोई ईसाई, जैन, बौद्ध, सब मार्ग हैं, धाराएँ हैं; किसी भी धारा में बहो, लक्ष्य एक ही है।
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