साधना और सत्य का मिलन: स्वयं की खोज
साधना और सत्य का मिलन: स्वयं की खोज

साधना और सत्य का मिलन: स्वयं की खोज
साधना और सत्य का मिलन: स्वयं की खोज
आज के भागदौड़ भरे जीवन में हर व्यक्ति सुख और शांति की तलाश में है। हम साधना, ध्यान और उपासना करते हैं, लेकिन क्या ये साधन हमें भगवान से मिला सकते हैं? प्रभु श्री अमित श्री का स्पष्ट मत है कि भगवान या आत्म-तत्व कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे किसी क्रिया या प्रयास से अर्जित किया जा सके।
अक्सर साधक मन को नियंत्रित करने के लिए साधना करते हैं, लेकिन वास्तविक साधना 'मन के रोकने' का प्रयास नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की प्रक्रिया है। जब तक हम 'मैं' को शरीर या मन के साथ जोड़कर देखते हैं, तब तक हम सत्य से दूर रहते हैं। जीव का भाव ही कर्मों का जाल बुनता है, और जब यह 'जीव भाव' समाप्त हो जाता है, तभी वास्तविक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रभु श्री सिखाते हैं कि भगवान अजन्मा और अविनाशी हैं, उन्हें किसी सीमित आकार या प्रकार में नहीं बांधा जा सकता। सच्चा आत्म-बोध तब होता है जब साधक को अपने भीतर से 'अन्य' की प्रतीति खत्म हो जाती है। यह बोध प्रयास से नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण और गुरु की कृपा से होता है।
वास्तविक ज्ञान का अर्थ यह नहीं है कि आप बहुत कुछ सीखें, बल्कि यह जानना है कि 'जानने वाला' स्वयं आप ही हैं। जब हम मान्यताओं और धारणाओं से मुक्त होकर अपनी सत्ता में स्थित होते हैं, तब द्वैत समाप्त होता है और परमात्मा का साक्षात्कार होता है। साधना का अंत अंततः गुरु के सानिध्य और स्वयं के बोध में ही है। अपने भीतर झांकें, क्योंकि सत्य आपसे दूर नहीं, आपके भीतर ही विद्यमान है।
प्रभु अमित श्री की अनमोल वाणी उसके यू ट्यूब चैनल "वासुदेव सर्वम" में उपलब्ध है।
शेयर करें
संबंधित खबरें

SDM खौड़ सतीश शर्मा को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

जिम्बाब्वे के खिलाफ होने वाली 3 मैचों की टी20 सीरीज के लिए टीम इंडिया का एलान हो गया है

कांग्रेस vs कांग्रेस इन पंजाब।। Channi vs राजा बेडिंग

मोदी कैबिनेट में बड़े फेरबदल की संभावना, बाहर हो सकते हैं बड़े चेहरे

