MAAsterG vaani- इस संसार के कण-कण में है पर कोई विरला ही क्यों इसे महसूस कर पाता है ?
परमात्मा इस संसार के कण-कण में है पर कोई विरला ही क्यों इसे महसूस कर पाता है ?

MAAsterG vaani- इस संसार के कण-कण में है पर कोई विरला ही क्यों इसे महसूस कर पाता है ?
भक्ति की विभिन्न अवस्थाएं
परमात्मा इस संसार के कण-कण में है पर कोई विरला ही क्यों इसे महसूस कर पाता है ? एक समय में या तो तू विषयों को भोग सकता है या परमात्मा को; दोनों को नहीं, दोनों का कभी मिलन नहीं हो सकता जैसे दिन और रात इकट्ठे नहीं हो सकते। तेरी यात्रा जन्म दर जन्म करोड़ों सालों से चलती आयी है ! तुझको एक जन्म में आकर या तो संसार की पूजा करनी है या परमात्मा की, एक की ही भक्ति करनी है। जो परमात्मा की पूजा में आते हैं, वो भक्त हो जाते हैं और जो संसार की पूजा करते हैं वो संसारिक होते हैं, आर्त-अथार्थी होते हैं । जिज्ञासु-ज्ञानी यानी परमात्मा की ओर चलने वाले । अब ये तुझे निर्णय करना है कि तू कहाँ खड़ा है, परमात्मा के लिए तेरा शौक कितना है वो तुझे झाँकना है; तू परमात्मा के लिए कितना जिज्ञासु है; या फिर तू आर्त या अथार्थी है यानी संसार के पदार्थों में ही खोया है और केवल जब संसार में टॉर्चर हुआ या टेंशन हुई तो सोचा चलो परमात्मा के द्वार। तू अपनी श्रेणी खुद तय कर क्यूंकि तुझे मालूम है कि तू कहाँ खड़ा है। कहा जब सब कुछ तेरा अच्छा हो रहा होता है तब तू भगवान के लिए भी आ जाएगा तो कौन सी मेहरबानी करेगा ! तकलीफ़ में ही तो भागना है ! जब संसार के अंदर रुकावट आए तभी तो तुझे सब कुछ छोड़कर दौड़ना है, उस समय ही तो परमात्मा तेरी परीक्षा लेगा कि आज देखूँ , आता है कि नहीं ! एक कहानी है दो लोगों की जिसमे एक मंदिर में रोज़ दीया जलाने वाला था और एक उस दिए को बुझाने वाला था। एक दिन दिया जलाने वाला कहता है कि आज बारिश बहुत है, छोड़ ना अब क्या जाना ! इतना तूफान है, दीया जलाऊंगा भी तो बुझ जाएगा, क्या फायदा है ! तो आज रहने देते हैं। पर दीया बुझाने वाला चल दिया, उसने नहीं देखा कि तूफान है या बारिश है, तो जैसे ही वो पहुँचा तो परमात्मा ने उसको दर्शन दे दिए और जो वर्षों से दीया जला रहा था उसको परमात्मा ने दर्शन नहीं दिए क्योंकि वो चूक गया ! इसलिए कहा कि जब तूफान, बारिश या आग लगी हो, जब तेरे जीवन में संकट आए, उस समय पाँव को मत रोकना, सोचना कि आज परमात्मा मेरी परीक्षा ले रहा है। पर हम परीक्षा में अक्सर फेल हो जाते हैं, हम हमेशा बहाने की तलाश करते हैं कि अरे ! मेरे घर में ये हो गया, वो हो गया, मैं सुबह उठा नहीं, रात को सोया नहीं; ये सब तेरे पास बहुत से बहाने हैं, बहाने वाला परमात्मा तक नहीं पहुँचता, वो जिज्ञासु नहीं है, भले वो कहे कि मैं जिज्ञासु हूँ पर वो अभी जिज्ञासु नहीं हुआ, उसने अभी सिर्फ राह की रोशनी देखी है, वो अभी सिर्फ गप्पे मारने वाला व्यक्ति है। वो अभी जिज्ञासु नहीं हुआ जिसकी चाल तेज हो गई और संसार की रुकावटों से भी नहीं रूकती ! तो हम जब तक अपने जीवन में तत्वज्ञान अपनाएंगे नहीं, जब तक हम सत्य को जानेंगे नहीं तब तक हम भक्त नहीं हो सकते; ये तो हम वैसे ही कहते हैं कि बड़ा प्यारा भक्त है ! ये पूजा करता है, पाठ करता है, व्रत रखता है, ग्रन्थ पढ़ता है, बहुत प्यारा भक्त है, लेकिन संतों ने ऐसी भक्ति को बाहरमुखी भक्ति कहा है, अंतर्मुखी पूर्ण भक्ति नहीं ! जब भक्ति अंतर्मुखी हो जाती है तो तेरे अंतःकरण के अंदर निर्मलता आ जाती है, पवित्रता आ जाती है, चेतना में जागृति आ जाती है, बाहर शरीर से तू संसार में अटकता नहीं है, तू संसार के पदार्थों और शक्लों में खोता नहीं है; अंतर्मुखी भक्ति वो है जहाँ तू रुकता नहीं है । तो जब तक हम जानेंगे नहीं कि भक्ति क्या है, भक्त क्या है, तब तक भगवान तेरा चिंतन नहीं करेगा ! फिर तू कहता है, कि मैं इतना भगवान का नाम लेता हूँ, इतना सत्संगों में जाता हूँ, इतना कुछ करता हूँ और फिर भी मेरे जीवन में ऐसे क्यों हो रहा है, इतने कष्ट मुझपर ही क्यों आ रहे हैं ! कष्ट तो संसार में सबके साथ हैं पर कष्ट तुझे दिखाई दे रहे हैं क्योंकि भगवान ने तेरा चिंतन अभी शुरू नहीं किया है, जब तेरे कष्ट तुझे दिखाई नहीं देंगे तो इसका अर्थ है कि भगवान ने तेरा चिंतन शुरू कर दिया है, जब तक तुझे दुख दिखाई दे रहे हैं तो इसका अर्थ है कि अभी तेरी यात्रा कहीं जिज्ञासु होने की ओर बढ़ रही है, तू अभी जिज्ञासु हुआ नहीं है l जैसे जैसे भक्ति अंतर्मुखी होगी, यात्रा अपने आप जिज्ञासु से ज्ञानी की ओर बड़ जाएगी और कृष्ण भगवान ने ज्ञानी को परमात्मा का रूप कहा है।
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